पिछले एक दशक में राजस्थान पत्रिका में बहुत कुछ ऐसा हुआ कि पाठक हैरान रहे, कर्मचारी परेशान। पत्रकारिता पर तो चर्चा ही क्या करें, ये हाल कमोबेश देश के हर मीडिया संस्थान का होता जा रहा है। पर पत्रिका ने मजीठिया दौर के बाद ठेके पर पत्रकार रखने शुरू किए। 2 साल होने से पहले हटा देना, पीएलआई के नाम पर सैलेरी में हर महीने धोखा। यही कारण रहा कि बड़े बड़े नाम पत्रिका से दूरी बनाने लगे। मौका देख कर या तो चले गए, या परिस्थितियां ऐसी रही, मैनेजमेंट ने हटा दिया।

लंबे समय बाद अब पत्रिका से कुछ अच्छी उम्मीद नजर आने लगी है। पत्रिका मास भर्तियों की तैयारी में है। कुछ दिन पहले नौकरी डॉट कॉम पर राजस्थान पत्रिका ने मैनेजिंग एडिटर की वैकेंसी शेयर की। मैसेज मीडिया जगत में वायरल होने लगा। अब लिंक्ड-इन पर पत्रिका समूह की तीसरी पीढ़ि के सिद्धार्ध कुलिश कोठारी ने मास भर्ती के संकेत दिए हैं। मैनेजिंग एडिटर, डिप्टी एडिटर्स, वीडियो, प्रिंट, डिजिटल, मल्टीमीडिया जर्नलिज्म के लिए कंपनी को पैशनेट लोगों की आवश्यक्ता है, ये संदेश सिद्धार्थ कोठारी के लिंक्डइन पोस्ट से नजर आता है। हालांकि मीडिया जगत में एक हवा यह कि पत्रिका बातें बड़ी करता है, काम छोटे। पैसे नहीं देगा। कही हश्र वैसा न हो जाए, जैसा टीवी चैनल का किया। वहीं एक उम्मीद यह भी है कि पत्रिका फिर से द राजस्थान पत्रिका की साख लौटाने की तैयारी में है। कुलिश जी के जमाने में जो पत्रकारिता की धार राजस्थान पत्रिका ने दिखाई, उसके किस्से आज भी लोग सुनाते हैं।
डिजिटल युग में दैनिक भास्कर की ऐप क्रांति के आगे ये अटकलें भी लगाई जा रही हैं, कि पत्रिका देशभर में दैनिक भास्कर ऐप को टक्कर देने के लिए टीम खड़ी कर रहा है। दैनिक भास्कर ने माइक्रो लेवल पर हाईपर लोकल की ताकत को रेखांकित किया और ऐप की एक अलग टीम खड़ी कर दी। ये बात अलग है कि दैनिक भास्कर की प्रिंट टीम ही अपनी डिजिटल टीम से रश्क करती कई मौकों पर दिखती है। पर यह भी सही है कि पैसे लेकर हिन्दी मीडिया में पाठक को खबर देने का इतिहास दैनिक भास्कर ऐप ने रच दिया। कंपनी ने अभी तक डेटा अनाउंस नहीं किया है लेकिन अंदर खाने खबर है कि पांच मिलियन से ज्यादा सबस्क्राइबर पूरे देश में पैसे देकर दैनिक भास्कर ऐप पर खबर पढ़ रहे हैं।
इसी क्रांति को टक्कर देने राजस्थान पत्रिका टीम जुटा रहा है। अगर ऐसा है तो पत्रिका में फिर एक नई ऊर्जा की उम्मीद मीडिया इंडस्ट्री कर सकती है।
उम्मीद पर दुनिया कायम है।