कभी सुना है अस्पताल में पुस्तक का विमोचन होते हुए ?

असप्ताल और किताब का विमोचन.. सुनने में हैरत भरा है. पर जयपुर के साकेत अस्पताल में पुस्तक का विमोचन भी हुआ और काव्यपाठ भी. पूरे वाक्ये को वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र बोड़ा जी के जरिए जानते हैं. बोड़ा जी ने इस अनूठे विमोचन की जानकारी अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर की. वहीं से हम साभार ये खबर आप तक पहुंचा रहे हैं.
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बोड़ा जी की कलम से——
ऐसा साकेत अस्पताल में ही हो सकता है। एक ऐसा अस्पताल जहां मरीज को ग्राहक नहीं समझा जाता और जहां चिकित्सा में मानवीय संवेदनाओं की ऊष्मा महसूस होती है।

वरिष्ठ पत्रकार भाई श्याम सुंदर आचार्य, जो दुर्दांत व्याधि कैंसर से जूंझते हुए इन दिनों साकेत अस्पताल में भर्ती हैं, की कविताओं के संग्रह की पुस्तक का गौरवमय विमोचन समारोह का आयोजन इस चिकित्सालय में ही अस्पताल प्रशासन ने किया।

श्याम जी को व्हील चेयर पर बिठा कर उस हॉलनुमा कमरे में चिकित्साकों की देखरेख अस्पताल कर्मी लेकर आये जहां उनकी पुस्तक ‘अंतर्दृष्टि’ का विमोचन उनके प्रशंसकों ने उनके सानिध्य में संयुक्त रूप से किया।

वरिष्ठतम पत्रकार प्रवीणचंद्र छाबड़ा, शिक्षाविद् पुरषोत्तम चतुर्वेदी, सेबी के पूर्व अध्यक्ष डी. आर. मेहता, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी श्यामसुंदर बिस्सा, दैनिक भास्कर के राज्य प्रमुख लक्ष्मी प्रसाद पंत और साकेत अस्पताल के प्रमुख डॉ. प्रवीण मंगलूनिया सभी ने मिल कर पुस्तक का लोकार्पण किया।

प्राकृत भारती अकादमी ने बिस्सा जी की प्रेरणा और मेहता साहब के निर्देश पर करीब एक ही हफ्ते में पुस्तक को तैयार करवा कर छपवाने का अकल्पनीय काम कर दिखाया।

पुस्तक विमोचन के यादगार पलों के साक्षी बनने वालों में श्यामजी के परिजनों के अलावा साकेत अस्पताल के डॉ. ईश मुंजाल, पत्रकार जगत परिवार के सदस्य महेंद्र मधुप, दैनिक नवज्योति के पूर्व संपादक महेश शर्मा, प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष लल्लू लाल शर्मा, वर्तमान अध्यक्ष अभय जोशी, वरिष्ठ जनसंपर्ककर्मी लक्ष्मण बोलिया, पत्रकार प्रकाश भंडारी, तरुण जैन, श्याम सुंदर लेखक राजेश व्यास तथा महानगर टाइम्स के मुख्य संपादक गोपाल शर्मा शामिल थे।

भाई मधुप ने श्यामजी का भाव भीना वक्तव्य पढ़ कर सुनाया

संकलन ‘अंतर्दृष्टि’ की पहली ही कविता में लेखक कहता है:
“प्राण अब इस देहरी को छोड़ रे/रोग की गठरी बनी जो/पीड की नगरी बनी जो/मोह में ही नित उलझ कर/क्षीण, कृश ठठरी बनी जो/फिर भी तू इसमें वैसा है/मोह बंधन तोड़ रे।”


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